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बृहस्पतिवार, 27 मार्च 2008

सूखी नदी

''जब मैं सागर थी
तब समाहित होती थी
सैकडों जलधाराएँ
मुझमें आकर,
क्रीडाये करती थी
असंख्य लहरें
मेरी आँचल के
हर छोर पर,
मेरा ही अंश लेकर
इठलाते थे मेघ
ऊँचे आकाश पर,
श्रृंगार करते थे
सूरज-चाँद-सितारें
मुझमें अपना
प्रतिबिम्ब निहारकर,
मेरे विस्तार की
सराहना होती थी
सर्वत्र,
पर अब
मै सागर नहीं रही
अब मैं
सूखी नदी हो गयी हूँ
जहाँ पर
दृष्टि नहीं जाती है
किसी की...''


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