LATEST:


विजेट आपके ब्लॉग पर

रविवार, 21 सितंबर 2008

जिन्दगी.....


जिन्दगी.....
आशा है निराशा है
अनसुलझी अबूझ परिभाषा है.
हंसना है रोना है
क्या सोचा क्या होना है.
हकीकत है कहानी है
जानकर भी अनजानी है.
जीत है हार है
जग का सार उपहार है.
दूरी है अधूरी ही
मजबूरी होकर भी जरूरी है.

2 टिप्‍पणियां:

संजीव आनंद ने कहा…

सुन्‍दर

आशा जोगळेकर ने कहा…

बहुत अच्छी कविता । आशा और निराशा ही तो जीवन का संतुलन बना कर रखतीं हैं और यही है जीवन का सार ।
मेरी कविता पर टिप्पणी देने के लिये धन्यवाद ।