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शुक्रवार, 29 फ़रवरी 2008

जिन्दगी....धूप हो गयी


''जिन्दगी...!
अब तू छांव नहीं रही,
अब तू धूप हो गयी है
मैं भी नहीं बचा सकातुम्हें
छाँव से धूप होने से,
अब इसमे
तपन के अलावा
कुछ भी नहीं,
लगता है
इसी धूप और तपन में
जिन्दगी की सार्थकता है
जीवन का कसाव है
छांव में नहीं...''

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