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शुक्रवार, 21 मार्च 2008

अंतर्मन की रोशनी


''एक रोशनी है मेरे पास
मेरे अंतर्मन को
आलोकित करती
हर पल...
हमेशा...,
लेकिन!
यह रोशनी
अभी तक है
संज्ञाविहीन ,
क्योंकि
न तो यह
चाँद-सितारों की रोशनी है
न सूरज की
न तो दीपक की रोशनी है
न ही विद्युत की,
फ़िर
क्या नाम दूँ इसे...
संज्ञाविहीन रोशनी
नहीं!!
इसे तो
'अंतर्मन की रोशनी'
कहना ही
उपयुक्त होगा...''

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